अहलेबैत समाचार एजेंसी “अबना” की रिपोर्ट के अनुसार, कई लोगों ने मिस्र के संविधान की धारा 152 का हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है कि विदेश में सैन्य मिशन के लिए सेना भेजने से पहले संसद के दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी जरूरी होती है। रशिया टुडे के अनुसार, मिस्र के सांसद मुस्तफा बकरी ने इस विवाद पर कहा कि विदेश में युद्ध मिशन के लिए सेना भेजने पर संसद की मंजूरी जरूरी होती है, लेकिन ये सैनिक किसी युद्ध में भाग लेने के लिए नहीं भेजे गए हैं। उन्होंने कहा कि खाड़ी के किसी भी अरब देश ने ईरान के खिलाफ युद्ध में हिस्सा लेने या उसकी तैयारी का ऐलान नहीं किया है, हालांकि इन देशों ने अपने यहां विदेशी सैन्य ठिकानों की मौजूदगी की अनुमति दी है।
बकरी ने जोर देकर कहा कि मिस्र की सेना केवल “रक्षा योजना” में भाग लेने के लिए भेजी गई है। जब उनसे पूछा गया कि इस बारे में घोषणा यूएई ने क्यों की, मिस्र ने क्यों नहीं, तो उन्होंने कहा कि यह “मिस्र और यूएई के बीच आपसी समझौते” का हिस्सा था।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति अब्दुल फत्ताह अल-सीसी और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद की मुलाकात और एयरबेस यात्रा को टीवी पर दिखाया गया था, इसलिए यह कोई गुप्त मामला नहीं था। बकरी ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर विवाद और सवाल उठते रहेंगे, लेकिन यह खुलासा दोनों देशों की सहमति से किया गया था और इसका एक “महत्वपूर्ण संदेश” है। उन्होंने मौजूदा बहस को “बिना मतलब का विवाद” बताया।
गौरतलब है कि यूएई ने गुरुवार को पहली बार अपने यहां मिस्र की वायुसेना की तैनाती की जानकारी सार्वजनिक की। यह घोषणा ऐसे समय हुई जब मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फत्ताह अल-सीसी अबूधाबी के दौरे पर थे और उन्होंने यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद से मुलाकात की थी।
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